सिद्ध सदन गणेश मंदिर, शहडोल: पौराणिकता, आस्था और लोक सेवा का संगम
जहां पांडवकाल की छाया में खिलती है आधुनिक भक्ति
शहडोल । मध्यप्रदेश।
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🔹 मंदिर की स्थापना: इतिहास में डूबी हुई एक जीवंत परंपरा
शहडोल स्थित सिद्ध सदन गणेश मंदिर का इतिहास पांडव युग से जुड़ा हुआ है। लंबे समय तक उपेक्षा में रहने के बाद इस मंदिर का पुर्नजागरण 1979 से पहले शुरू हुआ। स्थानीय होमगार्ड कार्यालय के एक सेवाभावी कर्मचारी और सोहागपुर के एक सेठ ने मिलकर यहां सफाई और भजन-कीर्तन का सिलसिला शुरू किया। इसके बाद यहां लोगों का जुटना शुरू हुआ और यह स्थान फिर से श्रद्धा का केंद्र बन गया।
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🔹 गणेश जी की मूर्ति: स्वयंभू और दिव्य रूप में विराजित
मंदिर में विराजमान गणेश जी की मूर्ति को स्वयंभू (स्वतः प्रकट) माना जाता है। यह मूर्ति विराट नगरी की विरासत को दर्शाती है और इसके साथ ही रिद्धि-सिद्धि, संतोषी माता और महाकाल की उपस्थिति इसे और भी विशेष बनाती है। भक्तों को यहां पारिवारिक पूजन और संपूर्ण देवी-देवताओं की आराधना का दुर्लभ अनुभव प्राप्त होता है।
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🔹 पर्व और अनुष्ठान: सालभर चलता रहता है भक्ति का सिलसिला
सिद्ध सदन मंदिर में गणेश चतुर्थी, शिवरात्रि, रामनवमी जैसे पर्वों पर भव्य आयोजन होते हैं। यज्ञ, भागवत कथा, कीर्तन और संत-संगति जैसे कार्यक्रम नियमित रूप से आयोजित होते हैं। इन आयोजनों में दूर-दराज से आए भक्त भी भाग लेते हैं, और यह स्थान धार्मिक मेलों और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक बन गया है।
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🔹 विशेष दिन: रविवार की रामायण पाठ और गणेश चतुर्थी की रौनक
हर रविवार को यहां दो वर्षों से नियमित रूप से रामायण पाठ हो रहा है, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु भाग लेते हैं। गणेश चतुर्थी के दिन हजारों भक्त एकत्र होकर विशेष पूजा-अर्चना में भाग लेते हैं। इस दिन मंदिर का माहौल अत्यंत भक्तिमय और उल्लासपूर्ण हो जाता है।
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🔹 दैनिक आरती व सेवाएं: श्रद्धा और अनुशासन का संगम
सेवानिवृत्त होमगार्ड अधिकारी श्री गोरेलाल पाठक मंदिर की दैनिक सेवा में लगे हुए हैं। सुबह-शाम की पूजा, भोग और आरती पूरी निष्ठा के साथ होती है, जिसमें आम भक्त भी भाग ले सकते हैं। यह सेवा-भाव मंदिर को जीवंत बनाए रखता है और श्रद्धालुओं को आत्मिक संतोष देता है।
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🔹 दिव्य अनुभूतियां: आस्था की शक्ति को महसूस करते हैं भक्त
कई श्रद्धालुओं का मानना है कि यहां पूजा-अर्चना करने से उन्हें मानसिक शांति और समस्याओं से मुक्ति मिलती है। यह मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि श्रद्धा और विश्वास का केंद्र बन चुका है जहां भक्तों को ईश्वर के निकट होने का अनुभव होता है।
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🔹 प्रबंधन: बिना ट्रस्ट, केवल सेवा से चलता मंदिर
मंदिर किसी ट्रस्ट द्वारा संचालित नहीं है, बल्कि स्थानीय होमगार्ड कार्यालय की निगरानी में और श्री गोरेलाल पाठक के सेवा-भाव से सुचारू रूप से चल रहा है। यह उदाहरण है कि केवल निष्ठा और लोकसेवा से भी एक मंदिर सुंदर और अनुशासित रूप में संचालित हो सकता है।
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🔹 सामाजिक महत्व और धार्मिक पर्यटन
यह मंदिर शहडोल ही नहीं, आसपास के जिलों के लिए भी आस्था का केंद्र है। इसकी लोकप्रियता और पौराणिकता इसे धार्मिक पर्यटन स्थल के रूप में उभारती है। यहां आने वाले श्रद्धालु आध्यात्मिक ऊर्जा के साथ-साथ संस्कृति और एकता का अनुभव करते हैं।
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🔹 प्राचीन बावड़ी: मंदिर की शोभा बढ़ाती ऐतिहासिक जलधारा
मंदिर के दक्षिण में स्थित प्राचीन बावड़ी यहां की विशेष धरोहर है। इसमें साल भर जल रहता है और इसका उपयोग भक्तजन करते हैं। यह बावड़ी पांडवकालीन मानी जाती है और इससे जुड़ी लोककथाएं इसे और अधिक आकर्षक बनाती हैं।
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🔹 विकास योजनाएं: सुविधाओं में हो रहा विस्तार
वर्तमान में मंदिर में टॉयलेट और स्नानघर का निर्माण हो रहा है ताकि भक्तों और पुजारियों को सुविधा मिल सके। पीछे की तरफ बाउंड्री वॉल बनाए जाने की योजना है ताकि मंदिर परिसर अधिक सुरक्षित और व्यवस्थित रह सके। भविष्य में धर्मशाला और हरा-भरा परिसर भी इस योजना में शामिल हैं।
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🌿 हरियाली और पर्यावरण संरक्षण का भी रखा गया ध्यान
मंदिर परिसर में फूल, बेलपत्र, हरसिंगार जैसे धार्मिक पौधों की उपस्थिति इसे न केवल पर्यावरण मित्र बनाती है, बल्कि धार्मिक वातावरण को भी सुखद बनाती है।
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सिद्ध सदन गणेश मंदिर न केवल भक्ति का केंद्र है, बल्कि सामाजिक सेवा, पर्यावरण जागरूकता और सांस्कृतिक एकता का जीवंत उदाहरण है। यह मंदिर हमें बताता है कि आस्था और सेवा मिलकर कैसे एक छोटे से स्थान को आध्यात्मिक ऊर्जा से ओतप्रोत तीर्थस्थल बना सकते हैं।
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