2028 चुरहट विधानसभा चुनाव: बदलते राजनीतिक समीकरण, नेतृत्व की तलाश और जनता का मूड


*राजधानी व्यू सीधी/तेज बहादुर सिंह*
चुरहट विधानसभा सीट मध्यप्रदेश की उन चुनिंदा सीटों में शामिल रही है, जहां चुनाव केवल उम्मीदवारों के बीच नहीं बल्कि राजनीतिक धाराओं, सामाजिक संतुलन और जनभावनाओं के बीच लड़ा जाता है। 2028 का विधानसभा चुनाव भले अभी समय दूर लगता हो, लेकिन ज़मीनी राजनीति में हलचल अभी से दिखाई देने लगी है। कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी—दोनों ही दलों के सामने इस बार अलग-अलग चुनौतियाँ और अवसर मौजूद हैं।
कांग्रेस: मजबूत आधार, लेकिन भविष्य का प्रश्न
कांग्रेस के लिए चुरहट अब तक एक सुरक्षित किला माना जाता रहा है। वर्तमान विधायक अजय सिंह का लगातार सात बार चुना जाना इस बात का प्रमाण है कि पार्टी को लंबे समय तक जनता का भरोसा मिलता रहा है। अजय सिंह न केवल विधायक रहे हैं, बल्कि क्षेत्र की राजनीति में उनका प्रभाव प्रशासनिक और संगठनात्मक स्तर तक देखा गया है।
हालांकि, समय के साथ एक बड़ा सवाल उभरकर सामने आता है—नेतृत्व की अगली पीढ़ी कौन?
राजनीतिक विरासत की बात करें तो फिलहाल अजय सिंह के परिवार से कोई भी सक्रिय रूप से चुनावी राजनीति में सामने नहीं है। ऐसे में कांग्रेस संगठन के भीतर यह चर्चा तेज़ हो गई है कि भविष्य में पार्टी को किस चेहरे पर भरोसा करना चाहिए।
केडी सिंह: जमीनी राजनीति से उभरता नाम
इसी संदर्भ में कृष्ण देव सिंह उर्फ केडी सिंह का नाम लगातार राजनीतिक चर्चाओं में बना हुआ है। सामान्य परिवार से आने वाले केडी सिंह की सबसे बड़ी ताकत उनकी जमीनी राजनीति मानी जाती है।
उन्होंने जिला पंचायत और जनपद पंचायत—दोनों स्तरों पर चुनाव जीतकर यह साबित किया कि वे केवल संगठन के भरोसे नहीं, बल्कि जनता के समर्थन से चुनाव जीतने की क्षमता रखते हैं।
खास बात यह रही कि उन्होंने दूसरे क्षेत्र से चुनाव लड़ते हुए वहां के स्थापित और दिग्गज नेताओं को पराजित किया। इससे यह संकेत मिलता है कि उनकी स्वीकार्यता केवल सीमित दायरे तक नहीं है।
लगातार जनता के बीच रहना, छोटे-छोटे मुद्दों पर सक्रियता दिखाना और संगठन से जुड़ाव—ये सभी कारण उन्हें कांग्रेस के भीतर एक संभावित भविष्य के चेहरे के रूप में स्थापित कर रहे हैं।
भाजपा हार के बाद आत्ममंथन और नई रणनीति
भारतीय जनता पार्टी के लिए चुरहट विधानसभा पिछले कुछ वर्षों से चुनौती बनी हुई है। 2023 के विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद पार्टी की स्थिति कमजोर मानी जा रही है।
स्थानीय स्तर पर यह चर्चा आम है कि पार्टी 2028 में 2023 के उम्मीदवार को दोहराने के मूड में नहीं है। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण चुनाव के बाद जनता के बीच कम दिखाई देना और संगठनात्मक सक्रियता का अभाव माना जा रहा है।
अनेंद्र मिश्रा ‘राजन’ भाजपा की नई उम्मीद
ऐसे माहौल में भाजपा के भीतर अनेंद्र मिश्रा ‘राजन’ का नाम तेजी से उभर रहा है। राजन की पहचान एक ऐसे नेता के रूप में बन रही है, जो लगातार जनता के बीच सक्रिय रहते हैं।
खासतौर पर युवाओं के साथ उनका संवाद और सामाजिक कार्यक्रमों में उनकी मौजूदगी उन्हें अलग पहचान दिलाती है।
इसके विपरीत, पूर्व विधायक शरदेंदु तिवारी से जुड़ा एक वायरल गाली-गलौज वाला वीडियो आज भी जनता के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है, जिसने पार्टी की छवि को नुकसान पहुंचाया।
राजन मिश्रा की मिलनसार छवि और संवादशीलता उन्हें युवाओं के बीच अधिक स्वीकार्य बनाती है, जो 2028 के चुनाव में एक निर्णायक वर्ग साबित हो सकता है।
अन्य नेता और भाजपा की सीमित विकल्प स्थिति
भाजपा के लिए स्थिति इसलिए भी कठिन हो गई है क्योंकि पूर्व सांसद अजय प्रताप सिंह अब पार्टी छोड़कर गोंडवाना गणतंत्र पार्टी में शामिल हो चुके हैं। उनके जाने के बाद चुरहट विधानसभा से भाजपा के पास कोई सर्वमान्य और सशक्त चेहरा सामने नहीं आता।
इस कारण संगठन और कार्यकर्ताओं के बीच यह धारणा बन रही है कि यदि भाजपा को 2028 में कांग्रेस को कड़ी टक्कर देनी है, तो उसे युवा, सक्रिय और जनता से जुड़े चेहरे पर ही दांव लगाना होगा—और इस कसौटी पर राजन मिश्रा फिलहाल सबसे उपयुक्त दिखाई देते हैं।
2028 के चुनाव में केवल पार्टी का नाम ही नहीं, बल्कि उम्मीदवार की जमीनी मौजूदगी,युवाओं से जुड़ाव,पुराने विवादों से दूरी,और स्थानीय मुद्दों पर स्पष्ट रुख जैसे कारक निर्णायक भूमिका निभाएंगे। चुरहट की जनता अब केवल चेहरे नहीं, बल्कि काम और व्यवहार को प्राथमिकता देती दिख रही है।
कुल मिलाकर, 2028 का चुरहट विधानसभा चुनाव कांग्रेस के लिए जहां नेतृत्व के क्रमिक परिवर्तन की परीक्षा होगा, वहीं भाजपा के लिए यह संगठन और चेहरे की पुनर्रचना का अवसर बन सकता है।
केडी सिंह और अनेंद्र मिश्रा जैसे नेता भविष्य की राजनीति की दिशा तय कर सकते हैं, लेकिन अंतिम फैसला जनता के बीच उनकी निरंतर सक्रियता और विश्वास पर ही निर्भर करेगा।

