इतिहास रचता फैसला: पहली बार दिल्ली हाईकोर्ट में हिंदी में निर्णय
नई दिल्ली | विशेष रिपोर्ट

दिल्ली की न्यायिक इतिहास में एक नई इबारत उस वक्त लिखी गई, जब दिल्ली हाईकोर्ट ने पहली बार हिंदी भाषा में निर्णय दिया। यह कोई सामान्य घटना नहीं थी, बल्कि एक आम नागरिक की दृढ़ इच्छाशक्ति और संवैधानिक अधिकारों की जिद का परिणाम था।
दिल्ली निवासी क्रांतिकारी गुलशन पाहुजा ने यह साबित कर दिया कि जब सवाल न्याय की भाषा का हो, तो एक अकेला इंसान भी पूरी व्यवस्था को सोचने पर मजबूर कर सकता है।
अवमानना के मुकदमे, लेकिन हौसले बुलंद
रोहिणी कोर्ट में व्याप्त कथित भ्रष्टाचार पर सवाल उठाने की कीमत गुलशन पाहुजा को भारी पड़ी। कुछ प्रभावशाली और तथाकथित “तुर्रमखां” वकीलों ने उनके खिलाफ Contempt of Court (न्यायालय की अवमानना) के मुकदमे दर्ज करवा दिए। मामला आखिरकार दिल्ली हाईकोर्ट तक पहुंचा।
हाईकोर्ट में ऐतिहासिक मांग
दिल्ली हाईकोर्ट के समक्ष पेश होते हुए गुलशन पाहुजा ने साफ शब्दों में कहा—
“मैं इस मामले की सुनवाई हिंदी में चाहता हूँ,
मैं वकील नहीं करूंगा,
और मुझे निर्णय भी हिंदी में ही दिया जाए,
क्योंकि मैं हिंदी जानता हूँ।
अगर बहस अंग्रेजी में होगी तो मैं समझ ही नहीं पाऊँगा,
और यह मेरे न्याय के अधिकार का उल्लंघन होगा।”
इतना ही नहीं, उन्होंने पूरे प्रकरण की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग की मांग भी रखी, ताकि न्यायालय में क्या संवाद हुआ, यह पूरी तरह पारदर्शी रहे।
न्यायपालिका को झुकना पड़ा
गुलशन पाहुजा की यह दलील केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकारों पर आधारित थी। न्यायालय को यह स्वीकार करना पड़ा कि जब देश की बहुसंख्यक आबादी हिंदी समझती है, तो न्याय केवल अंग्रेजी तक सीमित नहीं रह सकता।
परिणामस्वरूप, दिल्ली हाईकोर्ट ने पहली बार हिंदी में निर्णय लिखकर न्यायिक इतिहास में नया अध्याय जोड़ दिया।
यह सिर्फ एक फैसला नहीं, एक संदेश है
यह फैसला केवल गुलशन पाहुजा की व्यक्तिगत जीत नहीं है, बल्कि—
हिंदी भाषी नागरिकों के अधिकारों की जीत है
न्यायपालिका में पारदर्शिता की मांग है
और उस सोच को चुनौती है, जिसमें न्याय अंग्रेजी का मोहताज बना हुआ था
एक इंसान की जिद ने बदल दी व्यवस्था
यह घटना साबित करती है कि
“जब सवाल अधिकारों का हो, तो एक अकेली आवाज़ भी इतिहास बना सकती है।”
गुलशन पाहुजा ने यह दिखा दिया कि न्याय केवल मिलने का नाम नहीं,
समझ में आने का नाम भी है।

