“सफेदी में छिपा संघर्ष: ऐलबिनिज़्म को समझने और स्वीकारने का दिन”

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13 जून को मनाया जाता है ‘विश्व ऐलबिनिज़्म जागरूकता दिवस’, जो उन लाखों लोगों की पहचान, गरिमा और अधिकारों को मान्यता देने का अवसर है, जो ऐलबिनिज़्म नामक दुर्लभ आनुवंशिक स्थिति के साथ जीवन जीते हैं। यह दिन सिर्फ एक बीमारी को जानने का नहीं, बल्कि उस समाज को समझने का है, जो अक्सर इन लोगों को ‘अलग’ मानता है।

ऐलबिनिज़्म क्या है?


ऐलबिनिज़्म एक आनुवंशिक स्थिति है जिसमें शरीर में मेलानिन (Melanin) नामक रंगद्रव्य की कमी होती है। इससे व्यक्ति की त्वचा, बाल और आंखों का रंग बहुत हल्का होता है, और उन्हें तेज रोशनी व सूर्य की किरणों से भी संवेदनशीलता हो सकती है। पर यह केवल शारीरिक स्थिति नहीं, बल्कि सामाजिक स्तर पर भी कई चुनौतियाँ लेकर आती है।

भेदभाव और मिथक आज भी हैं जीवित


कई देशों में ऐलबिनिज़्म से पीड़ित लोगों को अंधविश्वास, सामाजिक बहिष्कार और हिंसा का सामना करना पड़ता है। विशेष रूप से अफ्रीकी देशों में उन्हें जादू-टोना से जोड़कर देखा जाता है, जिससे उनकी सुरक्षा को भी खतरा रहता है। भारत में स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर है, लेकिन जागरूकता अब भी बेहद ज़रूरी है।

इस दिन का उद्देश्य क्या है?


संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित यह दिवस ऐलबिनिज़्म से जुड़े मिथकों को तोड़ने, समान अधिकारों की मांग करने और इन लोगों को मुख्यधारा में लाने की पहल है। इसका नारा है – “Shining our light to the world” – यानी दुनिया को अपने प्रकाश से रौशन करना।

समाज की भूमिका बेहद अहम है


हमें यह समझने की आवश्यकता है कि ऐलबिनिज़्म कोई बीमारी नहीं, बल्कि एक जैविक अंतर है। शिक्षा, रोजगार, सामाजिक स्वीकार्यता और सुरक्षा – ये सब हर नागरिक का अधिकार है। मीडिया, स्कूल, संस्थान और समाज मिलकर इन लोगों के लिए एक समावेशी माहौल बना सकते हैं।

क्या आप तैयार हैं बदलाव के लिए?


13 जून सिर्फ कैलेंडर की एक तारीख नहीं, बल्कि संवेदनशीलता, समझदारी और स्वीकार्यता की ओर एक कदम है। आइए, इस दिन हम अपने सोचने का तरीका बदलें और हर रंग, हर रूप में जीवन का सम्मान करें।



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