गोत्र शब्द का अर्थ होता है वंश (lineage ) गोत्र प्रणाली का मुख्य उद्देश्य

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गोत्र शब्द का अर्थ होता है वंश (lineage ) गोत्र प्रणाली का मुख्य उद्देश्य है किसी व्यक्ति को उसके मूल प्राचीनतम व्यक्ति से जोड़ना ।



उदाहरण के लिए यदि कोई व्यक्ति कहे कि उसकी गोत्र भारद्वाज है तो इसका मतलब है कि उसकी पीढ़ी वैदिक ऋषि भारद्वाज से प्रारंभ होती है।

गोत्र विषय वर्तमान में बहुत वृहद और जटिल है साधारण बुद्धि और विवेक से इसे समझ पाना बहुत कठिन है।

गोत्र के द्वारा पुत्र व उसके वंश की पहचान होती है।
गोत्र निर्धारण के पीछे खास उद्देश्य है कुछ खास गुण सिर्फ पिता से मिलते हैं जो जींस रुप में पीढ़ी दर पीढ़ी फ्लो करते हैं। भले वो जिंस सोये हुए अवस्था में हो पर होगा

बच्चे अपने पिता से न केवल अपना चेहरा-मोहरा, बल्कि उनकी आदतें, सोचने का तरीका , समस्याओं को हल करने की क्षमता और यहां तक कि उनका स्वास्थ्य भी विरासत में पाते हैं, जो जीवनभर उनके साथ रहते हैं।

हमारे पुर्वज किसी न किसी विशिष्ट क्षेत्र में खास ज्ञान रखते थे । गोत्र बताते ही उस खास ज्ञान की पहचान हो जाती थी। और बच्चे को किस क्षेत्र में सफलता मिल सकती है ज्ञान हो जाता था।

गोत्र पिता से स्वता ही पुत्र को प्राप्त होता है परंतु पिता का गोत्र पुत्री को प्राप्त नहीं होता अब पुत्र को गोत्र मिलता है लेकिन उत्तरी को नहीं यह क्या कोई अन्य है नहीं ऐसा बिल्कुल नहीं आईए जानते हैं

स्कूल में विज्ञान ( science ) में हम लोगों को एक विषय पढ़ाया जाता था गुणसूत्र (chromosome ) आपने भी पढ़ा होगा । जानते होंगे इन गुणसूत्रो का काम क्या होता है।

यह गुणसूत्र ही होते हैं जो माता-पिता के गुण संतान में पहुंचने का कार्य करते हैं।प्रत्येक मनुष्य में 23 जोड़े गुणसूत्र होते हैं।
प्रत्येक व्यक्ति में एक गुणसूत्र माता से एक गुणसूत्र पिता से आता है यानी प्रत्येक कोशिका में 46 गुणसूत्र होते हैं जिसमें 23 माता से (XX) और 23 पिता से(XY) मिलता है ।
पुरुष के गुणसूत्र (XY)  स्त्री के गुणसूत्र (XX) से इंडिकेट किया जाता है । और यही (XX) और (XY) निर्धारित करती है कि पुत्र होगा या पुत्री

पिता का( X) और माता का (X) मिले तो पुत्री होती है ।वही पिता का y और माता का (X)  मिले तो पुत्र होता है।
मतलब लड़का होगा या लड़की पूरी तरह से पिता जिम्मेदार है।  पुत्र योग बनाने वाला गुणसूत्र y सिर्फ पुरुष के पास ही होता है और पुत्री देने वाला भी ।

फिर भी यह लड़का -लड़की का ठीकरा बेचारी औरतों के माथे पर फोड़ दिया जाता है ।

अब यह निश्चित हो गया कि y वाले गुणसूत्र जिससे पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है वह केवल पिता से आ सकता है।

और बस यही y गुणसूत्र का पता लगाना ही गोत्र का एकमात्र उद्देश्य है ।

और यह वैदिक पुत्र प्रणाली y गुणसूत्र पर आधारित है या कहे Y गुणसूत्र को ट्रेस करने का एक माध्यम है ।

क्योंकि स्त्रियों में वाई गुणसूत्र नहीं होता कामन XX गुणसूत्र होता है यही कारण है कि विवाह के पश्चात स्त्रियों को उसके पति के गोत्र के साथ जोड़ दिया जाता है।

वैदिक/ हिन्दू संस्कृति में एक ही गोत्र में विवाह वर्जित होने का मुख्य कारन यह है की एक ही गोत्र से होने के कारन वह पुरुष व् स्त्री भाई बहिन कहलाये क्यू की उनका पूर्वज एक ही है ।

परन्तु ये थोड़ी अजीब बात नही? की जिन स्त्री व् पुरुष ने एक दुसरे को कभी देखा तक नही और दोनों अलग अलग देशों में परन्तु एक ही गोत्र में जन्मे , तो वे भाई बहिन हो गये .?

इसका एक मुख्य कारन एक ही गोत्र होने के कारन गुणसूत्रों में समानता का भी है ।

आज की आनुवंशिक विज्ञान के अनुसार यदि सामान गुणसूत्रों वाले दो व्यक्तियों में विवाह हो तो उनकी सन्तति आनुवंशिक विकारों का साथ उत्पन्न होगी ।

ऐसे दंपत्तियों की संतान में एक सी विचारधारा, पसंद, व्यवहार आदि में कोई नयापन नहीं होता।

ऐसे बच्चों में रचनात्मकता का अभाव होता है। विज्ञान द्वारा भी इस संबंध में यही बात कही गई है कि सगौत्र शादी करने पर अधिकांश ऐसे दंपत्ति की संतानों में अनुवांशिक दोष अर्थात् मानसिक विकलांगता, अपंगता, गंभीर रोग आदि जन्मजात ही पाए जाते हैं।

आज हिंदुओं में गोत्र को स्मरण रखने की परंपरा का त्याग करने से गोत्र संकरता बढ़ रही है। और सगोत्र विवाह आदि होना आरम्भ हो गया है।

अब प्रश्न है कि घरवापसी वालो का या अज्ञात गोत्र धारियों का गोत्र निश्चय कैसे होगा?

गोत्र के सम्बन्ध में याज्ञवल्क्य और बौधायन दोनों का मत है कि कालान्तर में गोत्रों की संख्या सात न रहकर हज़ारों में हो गई।तब एक वंश-परम्परा में खानदान का जो मुख्य व्यक्ति हुआ,चाहे वह आदि काल में हुआ,या बीच के काल में हुआ,उसके नाम से गोत्र चल पड़ा!यहाँ तक में तो कोई दिक्कते नही है।

परम्परा प्रसिद्धं गोत्रम्-याज्ञवल्क्य

गोत्र सम्बन्धी परम्परा का निष्कर्ष यह है कि जिन लोगों का आदिपुरुष एक माना गया वे आपस में भाई-बहिन माने जाने से उनके बीच विवाह निषिद्ध माना गया। जहाँ तक व्यवहार का सम्बन्ध है,हिन्दूसमाज में सपिण्ड विवाह पहले भी होते रहे हैं और आज भी हो रहे हैं।
शास्त्रों के अनुसार इन्हीं कारणों से सगौत्र विवाह पर प्रतिबंध लगाया था।

महाभारत के समय से ही मामा की लड़की से विवाह को अति उत्तम, शुभ और कुलीन माना जाता था, गलत नहीं। मामा की बेटी को बहन की मान्यता नहीं दी गई है प्राचीन समय से ही।

नोद्वहेत्कपिलां कन्यां नाधिकाङ्क्षीं न रोगिणीम्।

नालोमिकां नातिलोमांन वाचाटां न पिङ्गलाम् ॥ ६ ॥

दक्षिण भारत में मामा की लड़की से विवाह होना आम बात है। महाराष्ट्र, गुजरात, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश और पूरे दक्षिणी भारत मे सगे मामा की बेटी से शादी का बहुत प्रचलन है।

यहाँ प्रश्न उठता है कि जैसे पिता का गोत्र छोड़ा जाता है वैसे ही माता का गोत्र छोड़ना जरूरी नही।

वीर्य की प्रधानता होने से पिता के गोत्र को पूरी तरह छोड़ना महर्षियों ने आवश्यक समझा। लेकिन मातृ पक्ष की लड़की ली जा सकती है अर्थात मामा की लड़की से शादी धर्मानुसार मान्य है। लेकिन अपने गोत्र में शादी पूर्णतः वर्जित/निषेध है…।

ऋषियों के अनुसार कई परिस्थतियाँ ऐसी भी है जिनमे गोत्र भिन्न होने पर भी विवाह नही होना चाहिए ।
देखे कैसे :
असपिंडा च या मातुरसगोत्रा च या पितु:
सा प्रशस्ता द्विजातिनां दारकर्मणि मैथुने

जो कन्या माता के कुल की छः पीढ़ियों में न हो और पिता के गोत्र की न हो , उस कन्या से विवाह करना उचित है ।
अर्थात लड़के के पिता के गोत्र की न हो ।
लड़के का गोत्र = पिता का गोत्र
अर्थात लड़की और लड़के का गोत्र भिन्न हो।
माता के कुल की छः पीढ़ियों में न हो ।

अर्थात पुत्र का अपनी माता के बहिन के पुत्री की पुत्री की पुत्री …………६ पीढ़ियों तक विवाह वर्जित है।

हिनक्रियं निष्पुरुषम् निश्छन्दों रोम शार्शसम् ।
क्षय्यामयाव्यपस्मारिश्वित्रिकुष्ठीकुलानिच ।।

-जो कुल सत्क्रिया से हिन्,सत्पुरुषों से रहित , वेदाध्ययन से विमुख , शरीर पर बड़े बड़े लोम , अथवा बवासीर , क्षय रोग , दमा , खांसी , आमाशय , मिरगी , श्वेतकुष्ठ और गलितकुष्ठयुक्त कुलो की कन्या या वर के साथ विवाह न होना चाहिए , क्यू की ये सब दुर्गुण और रोग विवाह करने वाले के कुल में प्रविष्ट हो जाते है ।
आधुनिक आनुवंशिक विज्ञानं से भी ये बात सिद्ध है की उपरोक्त बताये गये रोगादि आनुवंशिक होते है ।

इससे ये भी स्पष्ट है की वैदिक काल से ऋषियों को गुणसूत्र संयोजन आदि के साथ साथ आनुवंशिकता आदि का भी पूर्ण ज्ञान था


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